कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बोलने से बहुत कुछ बदल सकता है। लेकिन जज़बात को अगर न कहा जाये, तोह फिर बहुत कुछ बदल सकता है अपने अन्दर।
क्यूँ हम अपने बचपन को इतनी जल्दी बिताना चाहते हैं, जब की जवान होने की चाह में बचपन भी एक कठोर एहसास बनकर रह जाता है। क्यूँ किसी के दिल को ठेस न पहुचे, हम अपने आप को ठेस पहुचाने में झिझकते नहीं? क्यूँ हम अपने आप को दुसरे नंबर पर रखते हैं, और बाकी सबसे पहले होते हैं? अगर मै एक औरत हूँ तोह क्या मै अपने बारें में सबसे आखिर में सोचु? क्या एक बेटी, बहिन, माशुका, बीवी और माँ से बढकर मैं कुछ और नहीं हूँ? क्यूँ मैं समाज के अनुसआर अपनी जिवंशाला बिताऊँ? क्यूँ नहीं मैं जी सकती जैसे मैं चाहती हूँ? यह सवाल सिर्फ मेरा नहीं, पर उन सबका है जो चिल्ला चिल्ला के अपना अस्तित्व जाताना चाहते हैं। मुझे जीने दो। मुझपर रहम करो।
हर बार एक लाञ्चन लगा दिया जाता है क्यूंक मैं एक औरत हूँ। मुझे कुछ कहने का हक नहीं है। सब कुछ मेरी ज़िम्मेदारी है। नहीं, बस और नहीं। हर चीज़ की एक सीमा होती है, और आज समाज ने वोह लांघ ली है। अपने हक के लिए आज हर औरत लड़ना जानती है, और उससे किसी का दर नहीं। न समाज का, न परिवार का, किसी का भी नहीं।
क्यूँ हम अपने बचपन को इतनी जल्दी बिताना चाहते हैं, जब की जवान होने की चाह में बचपन भी एक कठोर एहसास बनकर रह जाता है। क्यूँ किसी के दिल को ठेस न पहुचे, हम अपने आप को ठेस पहुचाने में झिझकते नहीं? क्यूँ हम अपने आप को दुसरे नंबर पर रखते हैं, और बाकी सबसे पहले होते हैं? अगर मै एक औरत हूँ तोह क्या मै अपने बारें में सबसे आखिर में सोचु? क्या एक बेटी, बहिन, माशुका, बीवी और माँ से बढकर मैं कुछ और नहीं हूँ? क्यूँ मैं समाज के अनुसआर अपनी जिवंशाला बिताऊँ? क्यूँ नहीं मैं जी सकती जैसे मैं चाहती हूँ? यह सवाल सिर्फ मेरा नहीं, पर उन सबका है जो चिल्ला चिल्ला के अपना अस्तित्व जाताना चाहते हैं। मुझे जीने दो। मुझपर रहम करो।
हर बार एक लाञ्चन लगा दिया जाता है क्यूंक मैं एक औरत हूँ। मुझे कुछ कहने का हक नहीं है। सब कुछ मेरी ज़िम्मेदारी है। नहीं, बस और नहीं। हर चीज़ की एक सीमा होती है, और आज समाज ने वोह लांघ ली है। अपने हक के लिए आज हर औरत लड़ना जानती है, और उससे किसी का दर नहीं। न समाज का, न परिवार का, किसी का भी नहीं।
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